अमेरिका का बढ़ता व्यापार घाटा और भारत पर टैरिफ का दबाव

अमेरिका का बढ़ता व्यापार घाटा और भारत पर टैरिफ का दबाव

नई दिल्ली।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार के ताजा आंकड़े अमेरिकी दादागीरी की साफ तस्वीर पेश कर रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है, बावजूद इसके वे भारत पर भारी-भरकम टैरिफ थोप चुके हैं।

भारत पर टैरिफ की मनमानी

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह फैसला व्यक्तिगत खुंदक से प्रेरित है। कभी वे रूस से तेल आयात को लेकर भारत पर सवाल उठाते हैं, तो कभी भारी व्यापार घाटे को इसकी वजह बताते हैं। जबकि आंकड़े साफ दिखाते हैं कि अमेरिका का व्यापार घाटा भारत से ज्यादा कई अन्य देशों के साथ कहीं अधिक बड़ा है।

अमेरिका की आलोचना और भारत का रुख

भारत सरकार कई बार यह स्पष्ट कर चुकी है कि रूस से तेल आयात का यूक्रेन युद्ध से कोई संबंध नहीं है। वहीं व्यापार घाटे को लेकर भी तथ्य ट्रंप के आरोपों को झुठला रहे हैं। अमेरिका के लोग भी ट्रंप के इन कदमों की आलोचना कर रहे हैं।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि ट्रंप चाहते थे भारत यह माने कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाया है। भारत ने इसका समर्थन नहीं किया, जिससे उनकी नोबेल दावेदारी कमजोर पड़ गई। यही कारण है कि अब वे व्यापार घाटे और तेल आयात का मुद्दा उठा रहे हैं।

आंकड़े खुद बयान कर रहे सच्चाई

2024 में अमेरिका का भारत से व्यापार घाटा 41 अरब डॉलर रहा। लेकिन इस क्रम में चीन (271 अरब डॉलर), मेक्सिको (157 अरब डॉलर), वियतनाम (113 अरब डॉलर), आयरलैंड (81 अरब डॉलर), जर्मनी (76 अरब डॉलर), ताइवान (67 अरब डॉलर), जापान (63 अरब डॉलर) और दक्षिण कोरिया (60 अरब डॉलर) जैसे देश कहीं ऊपर हैं। चीन से तो अमेरिका का घाटा भारत की तुलना में सात गुना है।

टैरिफ के बावजूद निवेश में उछाल

दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप के टैरिफ वार के बावजूद भारत में अमेरिकी निवेश तेज़ी से बढ़ा है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2025) में अमेरिका से भारत को 5.61 अरब डॉलर एफडीआई मिला, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 1.5 अरब डॉलर से करीब तीन गुना है।

नतीजा

यह साफ है कि व्यापार घाटा सिर्फ बहाना है। असली समस्या ट्रंप की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि से जुड़ी है। आंकड़े बता रहे हैं कि भारत पर टैरिफ थोपने से अमेरिका को कोई वास्तविक लाभ नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर उसकी नीतियां सवालों के घेरे में आ रही हैं।