नई दिल्ली। मानसून सत्र में लगातार हंगामे और नारेबाज़ी के चलते संसद का कामकाज बुरी तरह प्रभावित रहा। आंकड़ों के मुताबिक, पूरे सत्र के दौरान लोकसभा में महज़ 37 घंटे और राज्यसभा में करीब 35 घंटे ही कामकाज हो पाया। इससे आक्रोशित होकर निर्दलीय सांसद उमेश पटेल ने सांसदों से ही सत्र का खर्च वसूलने की मांग उठाई है।
सामान्य तौर पर संसद का एक सत्र दर्जनों विधायी कार्यों और नीतिगत चर्चाओं का मंच होता है, लेकिन इस बार हालात उलटे रहे। मानसून सत्र में विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच तीखी नोकझोंक, हंगामे और बार-बार स्थगन के कारण बहस लगभग ठप हो गई। नतीजतन, जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीर विमर्श का समय बेहद सीमित रह गया।
लोकसभा में बोलते हुए सांसद उमेश पटेल ने कहा कि जब संसद चल ही नहीं पाती और जनता का पैसा व्यर्थ होता है, तो इसकी जिम्मेदारी खुद सांसदों पर तय होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि जितने दिन सत्र में काम न हो, उतने दिनों का खर्च सांसदों के वेतन और भत्तों से काटा जाना चाहिए।
पटेल का यह बयान आम जनता के गुस्से को भी आवाज़ देता है। देशभर में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि जब संसद में बहस और कामकाज नहीं हो पाता, तो जनता के करों से चलने वाला यह महंगा सत्र आखिर किस काम का।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मांग पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में संसद की कार्यवाही बाधित न हो और सांसद अपने संवैधानिक दायित्व को प्राथमिकता दें।